फुटबॉल मैच देखने गया था युवक, चार दिन तक जिंदा होने की आस में बैठा रहा परिवार… पांचवें दिन शव मिलने से टूट गया बूढ़े मां-बाप का सहारा………..
पाकुड़ के शहरकोल की उस खामोश खदान के किनारे शुक्रवार सुबह जो दृश्य था, उसने हर किसी की आंखें नम कर दीं। पानी की सतह पर तैरती एक लाश… और किनारे खड़े लोग, जिनकी आंखों में डर, उम्मीद और आखिरकार टूटन साफ झलक रही थी।वह लाश 28 वर्षीय कान्हू किस्कू की थी… वही कान्हू, जो चार दिन पहले घर से यह कहकर निकला था कि “बस अभी आता हूं”… लेकिन वह “अभी” कभी लौटकर नहीं आया।सुबह जब ग्रामीणों की नजर खदान पर पड़ी और पानी में तैरते शव को देखा, तो कुछ पल के लिए जैसे समय थम गया। किसी ने धीरे से कहा—“लगता है कान्हू है…” और फिर देखते ही देखते वहां चीख-पुकार मच गई।सूचना मिलते ही पुलिस पहुंची, लेकिन तब तक सब कुछ खत्म हो चुका था। खदान से बाहर निकाला गया शव अब सिर्फ एक शरीर था… जिसमें न सांस थी, न कोई उम्मीद।
चार दिन तक जलती रही उम्मीद की लौ
सोमवार की सुबह कान्हू सोनाजोड़ी स्थित अपने घर से निकला था। शहरकोल मैदान में फुटबॉल मैच देखा और फिर स्थानीय बच्चों ने उसे खदान की ओर जाते देखा था। जब वह देर तक वापस नहीं लौटा, तो घर में बेचैनी बढ़ने लगी। पत्नी की आंखें दरवाजे पर टिक गईं, बूढ़े मां-बाप बार-बार बाहर झांकते रहे… और छोटे-छोटे बच्चे हर आवाज पर दौड़ पड़ते—“पापा आ गए क्या?”
पर हर बार दरवाजा खाली ही मिला।
परिजनों ने खदान में तलाश की, ट्यूब डाले, नाव चलाई… लेकिन कान्हू का कोई पता नहीं चला। फिर भी उम्मीद थी—शायद कहीं और होगा, शायद लौट आएगा…लेकिन चार दिनों बाद वही खदान उसकी आखिरी मंजिल बनकर सामने आई।
मासूम सवाल, जिसका अब कोई जवाब नहीं
घर के आंगन में बैठे 6 साल के होपना और 4 साल के एलेक्स बार-बार एक ही सवाल पूछ रहे थे—
“मां, पापा कब आएंगे?”अब उस सवाल का जवाब किसी के पास नहीं है।जिस पिता के कंधों पर बैठकर वे दुनिया देखते थे, आज उसी पिता को लोग कंधे पर उठाकर श्मशान ले गए।
यह दृश्य देखकर वहां मौजूद हर शख्स की आंखें भर आईं
बुजुर्ग मां-बाप की टूटी दुनिया
कान्हू अपने बूढ़े माता-पिता का सहारा था। अब वह सहारा हमेशा के लिए छिन गया। मां बार-बार बेहोश हो जा रही थी, पिता की आंखों से आंसू थमने का नाम नहीं ले रहे थे।जिस घर में कभी हंसी गूंजती थी, वहां अब सिर्फ सिसकियां और खामोशी रह गई है।
प्रशासन पर उठे सवाल, पर दर्द से बड़ा कुछ नहीं
परिजनों का कहना है कि अगर समय रहते गोताखोर बुलाए जाते, तो शायद पहले ही सच्चाई सामने आ जाती। चार दिनों तक सिर्फ इंतजार और भरोसा मिला, लेकिन कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया।अब जब सच सामने है, तो सवाल भी हैं… गुस्सा भी है…लेकिन इन सबसे बड़ा है एक परिवार का दर्द, जो कभी खत्म नहीं होगा।खदान के उस ठहरे पानी में सिर्फ एक शव नहीं मिला…
वहां एक परिवार की उम्मीदें, बच्चों का बचपन और मां-बाप का सहारा डूबा हुआ मिला।
